भगवद्गीता 5.10: कर्मयोग से मुक्ति कैसे?

भगवद्गीता 5.10 का रहस्य कर्मयोग से पाप और बंधन से मुक्ति कैसे पाएँ

भगवद्गीता 5.10 का रहस्य: कर्मयोग से पाप और बंधन से मुक्ति कैसे पाएँ?

नमस्कार प्रिय साधकों,

आज का आलेख एक ऐसे सवाल के साथ शुरू करने जा रहा हूँ जिसका उत्तर जानना हम सभी के लिए अति आवश्यक है। क्या संसार में रहते हुए, अपने सभी कर्तव्य निभाते हुए भी हम पाप और मानसिक तनाव से मुक्त रह सकते हैं? क्या गृहस्थ जीवन जीते हुए भी आंतरिक शांति संभव है?

(1) इसका उत्तर हमें भगवद्गीता के पाँचवें अध्याय के दसवें श्लोक में मिलता है।

श्लोक – भगवद्गीता 5.10

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि संगं त्यक्त्वा करोति यः।

लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥ 5.10॥

इस श्लोक का सरल अर्थ:

जो व्यक्ति अपने सभी कर्म भगवान को समर्पित करके, फल की आसक्ति छोड़कर कार्य करता है, वह पाप से नहीं लिप्त होता — जैसे कमल का पत्ता पानी में रहकर भी भीगता नहीं।

https://www.holy-bhagavad-gita.org/chapter/5/verse/10/

(2) कमल पत्र का अद्भुत उदाहरण – कर्मयोग का रहस्य

गीता यहाँ एक अत्यंत सुंदर उदाहरण देती है — कमल का पत्ता।

कमल का पत्ता जल में रहता है, जल उसके चारों ओर होता है, फिर भी वह जल से लिप्त नहीं होता यानि जल का एक बून्द भी कमल के पत्ते के ऊपर नहीं ठहरता। ।

क्यों? क्योंकि उसकी प्रकृति ऐसी है कि पानी उस पर टिक नहीं पाता।

इसी प्रकार —

हम संसार में रहें  – परिवार, समाज, नौकरी, व्यापार सब करें

लेकिन मन में “मैं” और “मेरा” की आसक्ति न रखें

तो कर्म हमें बाँध नहीं पाते। चलिए एक उदाहरण से इसे समझते हैं –

(3) डाकिये के तरह – माध्यम बनें, मालिक नहीं

मान लीजिए एक डाकिया (Postman) पत्र बाँटता है।

किसी पत्र में शुभ समाचार है,किसी में दुखद समाचा। 

कहीं नौकरी का नियुक्ति पत्र है, तो कहीं अस्वीकृत। 

तो यहाँ पर एक साल आता है की क्या डाकिया खुश या दुखी होता है?

नहीं।

क्योंकि वह केवल माध्यम है।

यदि हम भी अपने कर्मों को “भगवान का कार्य” मानकर करें, तो हम परिणाम के बोझ से मुक्त रह सकते हैं। जब परिणाम के बारे में आप नहीं सोचते तो फल कुछ भी मिले,आप दुखी नहीं होते। 

(4) चलिए एक और उदाहरण से इसे समझते हैं -

 बीज और किसान का उदाहरण – परिणाम हमारे हाथ में नहीं

एक किसान बीज बोता है,भूमि तैयार करता है,सिंचाई करता है,देखभाल करता है

लेकिन वर्षा होगी या नहीं?,फसल कितनी होगी?  – यह उसके नियंत्रण में नहीं।

इसी प्रकार —

कर्म हमारा अधिकार है, फल ईश्वर के अधिकार क्षेत्र में है।

जब हम फल पर नियंत्रण छोड़ देते हैं, तब मानसिक शांति प्राप्त होती है।

(5) तो असली समस्या कर्म नहीं, “अहंकार” है

गीता कर्म छोड़ने को नहीं कहती।

वह कहती है — अहंकार छोड़ो।

समस्या यह नहीं कि हम कार्य करते हैं।

समस्या यह है कि हम सोचते हैं —“मैं कर रहा हूँ”,“यह मेरा है”,“मुझे ही फल मिलना चाहिए”- यही अहंकार बंधन का कारण है।

(6) गृहस्थ जीवन में कर्मयोग कैसे अपनाएँ?

एक गृहस्थ भी पूर्ण योगी हो सकता है यदि वह अपने कार्य ईश्वर को समर्पित करे और फल की चिंता छोड़ दे तथा सफलता-असफलता में समभाव रखे, यह मानते हुए की वह तो केवल एक माध्यम है। 

मित्रों,सुबह उठकर एक संकल्प लें:

“आज के सभी कर्म मैं भगवान को समर्पित करता हूँ।”

देखिए, जीवन कितना सरल और शांत हो जाता है।

(7) आसक्ति ही दुःख का कारण है-

जब हम परिणाम से चिपक जाते हैं —अपेक्षा बढ़ती है,चिंता बढ़ती है,निराशा आती है,क्रोध उत्पन्न होता है

लेकिन जब हम कहते हैं —

“फल जैसा भी हो, वह ईश्वर की इच्छा है”

तब मन हल्का हो जाता है।

(8) दोस्तों, संसार में रहें, पर संसार को अपने भीतर मत रहने दे।

हमारा शरीर प्रकृति का है,लेकिन चेतना दिव्य है।

यदि हम शरीर को “अपनी संपत्ति” मानकर कर्म करेंगे, तो बंधन होगा।

यदि उसे “ईश्वर की देन” मानकर सेवा में लगाएंगे, तो मुक्ति होगी।

(9) इस श्लोक का सार है कि-

कर्म करो,फल की आसक्ति छोड़ो,अहंकार त्यागो,स्वयं को माध्यम मानो,सब कुछ ईश्वर को समर्पित करो

तब जीवन कमल पत्र की तरह निर्मल रहेगा।

(10) निष्कर्ष:- कर्मयोग ही आंतरिक शांति का मार्ग

भगवद्गीता 5.10 हमें सिखाती है कि मुक्ति जंगल में जाकर नहीं, बल्कि दृष्टिकोण बदलकर मिलती है।

गृहस्थ रहते हुए भी, संसार में कार्य करते हुए भी,

यदि हम समर्पण और निरहंकार भाव से कर्म करें,

तो जीवन सरल, पवित्र और शांत हो जाता है।

(11) एक छोटा अभ्यास करें

रोज सुबह स्वयं से कहें:

“मैं कर्म करूंगा, लेकिन फल ईश्वर को समर्पित है।”

कुछ ही दिनों में आप अनुभव करेंगे कि मन हल्का हो रहा है और भीतर शांति बढ़ रही है।

यदि यह लेख आपको प्रेरित करे, तो इसे साझा करें और अपने आध्यात्मिक जीवन में कर्मयोग को अपनाएँ

(12) चलिए अब कुछ सवाल- जवाब भी ले लेते हैं -Frequently Asked Questions (FAQ)

(a) भगवद्गीता 5.10 का मुख्य संदेश क्या है?

भगवद्गीता 5.10 का मुख्य संदेश यह है कि मनुष्य अपने सभी कर्म भगवान को समर्पित करके और फल की आसक्ति छोड़कर कार्य करे। ऐसा करने पर वह पाप और मानसिक बंधन से मुक्त रहता है, जैसे कमल का पत्ता पानी में रहकर भी भीगता नहीं।

(b) “ब्रह्मण्याधाय कर्माणि” का क्या अर्थ है?

“ब्रह्मण्याधाय कर्माणि” का अर्थ है — अपने सभी कर्मों को ब्रह्म अर्थात् परमात्मा को अर्पित करना। इसका मतलब है कि हम कार्य तो करें, लेकिन अहंकार और स्वार्थ छोड़कर उसे ईश्वर की सेवा समझकर करें।

(C) क्या गीता कर्म छोड़ने के लिए कहती है?

नहीं। गीता कर्म त्यागने के लिए नहीं, बल्कि अहंकार और आसक्ति त्यागने के लिए कहती है। कर्म करना जीवन का धर्म है, लेकिन फल की अपेक्षा और “मैं” भाव छोड़ना ही सच्चा कर्मयोग है।

(d) कमल के पत्ते का उदाहरण क्यों दिया गया है?

कमल का पत्ता पानी में रहते हुए भी उससे लिप्त नहीं होता। उसी प्रकार, मनुष्य संसार में रहते हुए भी यदि आसक्ति छोड़ दे, तो वह कर्मों से बंधता नहीं। यह उदाहरण आंतरिक वैराग्य को समझाने के लिए दिया गया है।

(e) गृहस्थ जीवन में कर्मयोग कैसे अपनाएँ?

गृहस्थ जीवन में कर्मयोग अपनाने के लिए:

प्रतिदिन अपने कार्य ईश्वर को समर्पित करें

फल की चिंता कम करें

सफलता और असफलता में समभाव रखें

स्वयं को केवल माध्यम समझें

यही दृष्टिकोण जीवन को शांत और संतुलित बनाता है।

(f) क्या फल की इच्छा रखना गलत है?

सामान्य इच्छा स्वाभाविक है, लेकिन फल के प्रति अत्यधिक आसक्ति दुःख का कारण बनती है। गीता कहती है — कर्म करो, पर फल को ईश्वर पर छोड़ दो। इससे मानसिक शांति मिलती है।

(g) क्या कर्मयोग से वास्तव में मानसिक शांति मिलती है?

हाँ। जब व्यक्ति परिणाम की चिंता छोड़ देता है और स्वयं को केवल माध्यम मानता है, तब तनाव कम होता है। अपेक्षा घटती है और मन हल्का होता है। यही कर्मयोग की आंतरिक शांति है।

(h) क्या कर्मयोग और संन्यास अलग हैं?

गीता के अनुसार सच्चा संन्यास कर्म त्यागना नहीं, बल्कि आसक्ति त्यागना है। इसलिए कर्मयोग ही श्रेष्ठ मार्ग है, जिसमें व्यक्ति संसार में रहते हुए भी आंतरिक रूप से मुक्त रहता है।

(j) “लिप्यते न स पापेन” का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है — ऐसा व्यक्ति पाप से लिप्त नहीं होता। जब कर्म स्वार्थ और अहंकार से मुक्त होकर किए जाते हैं, तो वे आत्मा को बाँधते नहीं।

(k) क्या रोज एक छोटा अभ्यास करने से जीवन बदल सकता है?

हाँ। यदि प्रतिदिन सुबह यह संकल्प लें:

“आज के सभी कर्म मैं ईश्वर को समर्पित करता हूँ।”

तो धीरे-धीरे दृष्टिकोण बदलता है और जीवन में शांति का अनुभव बढ़ता है।

 

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