आत्मा क्या है? | आत्मा का अर्थ – आध्यात्मिक और वैज्ञानिक विश्लेषण

आत्मा क्या है? | आत्मा का अर्थ – आध्यात्मिक और वैज्ञानिक विश्लेषण

आत्मा क्या है

Introduction (भूमिका):-

प्रिय साधक गण, मनुष्य सदा से एक प्रश्न पूछता आया है – “मैं कौन हूँ?”

  • क्या मैं यह शरीर हूँ, जो जन्म लेता है और एक दिन नष्ट हो जाता है?
  • क्या मैं मन हूँ, जो कभी शांत है तो कभी अशांत? या मैं कुछ और हूँ – जो इन सबका साक्षी है?

जी हाँ दोस्तों, आत्मा क्या है? आत्मा वह शुद्ध चेतना या द्रष्टा है जो शरीर, मन और बुद्धि का साक्षी बनकर सब कुछ देखती रहती है। आधुनिक विज्ञान इसे चेतना (consciousness) के रूप में समझने का प्रयास कर रहा है।

इस लेख में हम आत्मा को शास्त्रों की दृष्टि से एवं विज्ञान की दृष्टि से परखने का प्रयास करेंगे।

आध्यात्मिक दृष्टि से आत्मा क्या है?--

मित्रों, जैसा कि आपको पता है – यह शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार इत्यादि हमेशा बदलते रहते हैं। शरीर में प्रतिदिन कई करोड़ कोशिकाएँ (cells) मरती और जन्म लेती हैं, यानि यह शरीर परिवर्तनशील है।

उसी तरह हमारा मन, बुद्धि और अहंकार भी हमेशा परिवर्तनशील है। ये सारे नित्य बदलते रहते हैं। मेरे प्रिय मित्रों, जो बदलाते रहता है – वह आत्मा नहीं हो सकता।

आत्मा तो वह है जो चूपचाप हमारे भीतर बैठकर इन बदलाओं को देखते रहता है। यानि यह एक साक्षी (Witness) है, द्रष्टा है और इसी प्रकार बैठकर अनुभव प्राप्त करते रहता है।

अर्थात आत्मा एक मूर्ति के तरह बैठकर हमारे अन्दर हो रहे परिवर्तन को देखने वाली चेतना है। यह परमात्मा का ही अंश है जो हर प्राणी को जीवित रखती है।

सभी आत्माएँ परमात्मा से ही निकलकर जीव में प्रवेश करने के लिए आती हैं। जब आत्मा किसी शरीर में प्रवेश करती है तो वह जीवधारी या जीवात्मा कहलाने लगती है।

हमारे देह के भीतर निवास करने के कारण आत्मा (जीवात्मा) को देही भी कहा जाता है। जबतक यह देही (आत्मा) हमारे शरीर के भीतर उपस्थित है, हम जीवित रहते हैं।

जैसे ही वह शरीर छोड़ देती है, तो शरीर को मृत घोषित कर दिया जाता है

यानि आत्मा वह शक्ति है जो प्रकाश या ऊर्जा के रूप में हमारे भीतर रहती है जिसके कारण हम जीवित रहते हैं। यह आत्मा ही है जिसके चलते हमारे शरीर के भीतर हलचल होते रहती है।

मित्रों, आत्मा हमारे शरीर के भीतर तो रहती है परन्तु अदृश्य रूप में।

जैसा कि हम जानते हैं, ईश्वर भी अदृश्य रहते हैं और आत्मा तो ईश्वर का ही अंश है, तभी तो वह भी दिखाई नहीं देती परन्तु उसका अनुभव हम कर सकते हैं।

बल्व में बिजली (electricity) दिखाई नहीं देती है परन्तु भीतर में उसकी उपस्थिति के कारण बल्व जलता है।

ठीक उसी तरह यह आत्मा दिखाई तो नहीं देती परन्तु हमोरे भीतर वह रहती है जिसके कारण हम जीवित रहते हैं और हमारे शरीर के अंदर बहुत सारे हलचल होते रहती हैं।

इसलिए जब हम यह प्रश्न करते हैं कि आत्मा क्या है, तो उत्तर यही मिलता है कि आत्मा वह शुद्ध चेतना है जो शरीर, मन और बुद्धि के सभी परिवर्तनों की साक्षी बनकर उन्हें अनुभव करती है।
संक्षेप में, आत्मा क्या है—यह समझना ही आत्मज्ञान की प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण सीढ़ी है।

आत्मा क्या है – मानव शरीर और शुद्ध चेतना

शरीर आत्मा के लिए एक गाड़ी है --

आत्मा इस शरीर को एक वाहन / गाड़ी (vehicle) के तरह उपयोग में लाती है।

इस शरीर के द्वारा बहुत सारे कर्म होते हैं जिनमें कुछ अच्छे तो कुछ बुरे । इन सारे कर्मों के माध्यम से आत्मा अपना अनुभव (experience) बढ़ाते रहती है।

वास्तव में जब आत्मा शरीर धारण करती है तो वह जीवात्मा कहलाने लगती है तब वह अनेक तरह के अनुभव के माध्यम से अपना प्रगति करते रहती है।

जैसे ही शरीर पुराना या अनुपयोगी हो जाता है तो फिर आत्मा इसका त्याग कर देती है जिसे हम साधारण भाषा में मौत कहते हैं।

वास्तव में हम तो आत्मा हैं जिसका मौत कभी नहीं होता है। जब शरीर उपयोगी नहीं रह जाता है तो फिर आत्‌मा उस शरीर का क्या करेगी ? वह उसे त्याग देती है और नये शरीर में प्रवेश कर जाती है।

यह बिल्कुल उसी तरह है जैसे एक व्यक्ति गाड़ी खरिदता है तो उसका उपयोग तबतक करता है जबतक वह पुरानी या जर्जर न हो जाए। जब वह गाड़ी अनुपयोगी हो जाती है तो गाड़ी मालिक भी उसे त्याग देता है और जरूरत पड़‌ने पर नई गाड़ी खरीद लेता है।

तो साधकों,आत्मा को एक गाड़ी का Driver या Owner समझें और शरीर को एक गाड़ी। जब शरीर ज्यादा पुराना या रोग-ग्रसित हो जाता है तब आत्मा उसे हटा देती है जिसे हमलोग मौत कहते हैं।

वास्तव में आत्मा तो सिर्फ अपना गाड़ी यानी शरीर बदलते रहती है।

इस दृष्टि से समझें तो आत्मा क्या है—वह चेतन चालक है जो शरीर रूपी वाहन का उपयोग करता है, उसे छोड़ता है, पर स्वयं कभी नष्ट नहीं होता।

इसी चीज को समझाते हुए श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कुरुक्षेत्र के युद्ध स्थल में कहा था–

वासांसि जिर्णानि यथा विहाय, नवानि गृह्णाति नरोपराणि ।

तथा शरीराणि विहाय जीणीनि, अन्यानि संयाति नवानि देही ।। (Bhagwadgeeta 2:22)

यानि जिस प्रकार मनुष्य अपने फटे-पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा पुराने तथा व्यर्थ के शरीरों को त्यागकर नये शरीर धारण करती है।

आत्मा क्या है? यह श्लोक बताता है कि आत्मा वह शाश्वत और अमर तत्व है जो शरीर को मात्र एक वस्त्र या वाहन की तरह इस्तेमाल करती है। शरीर पुराना हो जाता है, नष्ट हो जाता है, लेकिन आत्मा कभी पुरानी नहीं होती – वह सिर्फ शरीर बदलती रहती है।

अर्जुन का महामारत के युद्ध में अपने कर्तव्यों से भागना :-

जब महामारत का युद्ध होने जा रहा था तब अर्जुन आत्म ज्ञान के अभाव के चलते ही मोहग्रस्त हो गया था और अपने कर्तव्यों से पिछा छुड़ाना

चाह रहा था तब जाकर श्रीकृष्ण ने उसे उसी मैदान पर आत्मज्ञान दिया और तब जाकर वह धर्मयुद्ध करके कौरवों को परास्त किया।

आत्मा के लिए किसी भी काल में न तो जन्म है, न तो मृत्यु । वह न तो कभी जन्मा है, न जन्म  लेता है और न  जन्म  लेगा ।

वह अजन्मा, नित्य, शाश्वत (स्थायी) तथा अति प्राचिन है। शरीर के मारे जाने पर भी वह मारा नहीं जाता। यही ज्ञान अर्जुन को श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में दिया था।

न जायते म्रियते वा कदाचिन् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।

अजो नित्यः शाश्वतोयं पुराणों न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥ (Bhagwadgeeta 2:20)

आत्मा क्या है? यह श्लोक स्पष्ट करता है कि आत्मा वह अमर और अविनाशी तत्व है जो जन्म-मृत्यु के चक्र से परे है। शरीर नश्वर है, बदलता है और नष्ट हो जाता है, लेकिन आत्मा सदा एकसमान, अपरिवर्तनीय और शाश्वत रहती है।

आत्मज्ञान से डर खत्म:-

दोस्तों, आत्मा को जानने से जीवन में डर खत्म हो जाता है। मृत्यु का डर नहीं रहता, क्योंकि हम Real में आत्मा हैं और आत्मा कभी मरती नहीं।

यह ज्ञान हमें अच्छे कर्म करने की प्रेरणा देता है, ताकि आत्मा ऊँचे लोकों में जाए और अंत में अपने Source यानि परमात्मा से मिल जाए।

आत्मा क्या है? आत्मा वह अमर और शाश्वत चेतना है जो शरीर के नष्ट होने पर भी अजर-अमर रहती है, जिसे जान लेने से जीवन निर्भीक और शांतिपूर्ण हो जाता है।

आत्मा के बारे में विज्ञान क्या कहता है?

विज्ञान आत्मा न तो सिद्ध करता है, न ही खंडित करता है। क्योंकि-

1) विज्ञान उसी का अध्ययन करता है जो मापा जा सके, जो तौला जा सके और जो प्रयोगशाला में दिखे |

आत्मा मापने या तौलने योग्य वस्तु नहीं है, यह तो अनुभव का विषय है।

2) विज्ञान आत्मा के जगह इन शब्दों का प्रयोग करता है

Consciousness (चेतना), Awareness (जागरूकता), observer/Experiencer (द्रष्टा = witness)

लेकिन ध्यान रखें – विज्ञान यह तो मानता है कि चेतना है, पर यह क्या है और कहाँ से आती है – इस पर विज्ञान आज भी सही उत्तर नहीं देता।

न्यूरो साइंस क्या कहता है?-

न्यूरोसाइंस कहता है –

विचार – दिमाग की गतिविधि है

याददाश्त- न्यूरॉन्स का नेटवर्क है

भावना (emotions) – chemicals और signals है

लेकिन एक समस्या है – शरीर और दिमाग तो समझ में आ रहे लेकिन अनुभव करने वाला ” मैं” अब भी रहस्य का विषय है।

इसी कारण विज्ञान आज भी इस प्रश्न पर मौन है कि आत्मा क्या है, क्योंकि अनुभव करने वाला “मैं” अभी तक किसी प्रयोगशाला में मापा नहीं जा सका है।

निंद / बेहोशी / मृत्यु -- विज्ञान की सीमा

Deep sleep में दिमाग बिलकुल शांत, विचार बिलकुल नहीं – फिर भी जागने पर कहते हैं – “मैं गहरी निंद में था” । यह “मैं” कौन है, जिसने निंद को जाना – नींद का मजा लिया ?

आत्मा क्या है? आत्मा वह शुद्ध साक्षी चेतना है जो जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति (गहरी नींद) सभी अवस्थाओं में निरंतर उपस्थित रहती है, बिना बदले अनुभव करती रहती है।

New scientific theory recognizes life’s spiritual dimension: https://www.psychologytoday.com/us/blog/biocentrism/201112/does-the-soul-exist-evidence-says-yes

निष्कर्ष -

1) विज्ञान प्रमाण (Evidence) पर चलता है जो देखा और मापा जा सके । आत्मा को मापा नहीं जा सकता इसलिए विज्ञान कहता है-“कोई proof नहीं – कोई प्रमाण नहीं है।

2 )लेकिन विज्ञान ये नही कहता कि “आत्मा विल्कुल नही है।” सिर्फ कहता है- “अभीतक कोई सबुत नहीं मिला।

3) देवियों और सज्जनों, अध्यात्म में आत्मा अनुभव से पता लगती है यानि ध्यान और योग से। विज्ञान और अध्यात्म एक दूसरे के पूरक हो सकते हैं – विज्ञान बाहर की दुनियाँ समझता है, अध्यात्म अंदर की।

दोस्तों, विज्ञान बदलता रहता है -कल नई खोज हो सकती है। लेकिन अभी मुख्य मत यही है कि आत्मा जैसी अमर चीज का Scientific evidence नहीं है।

लेकिन ध्यान और योग के अन्य साधनों से आप इसे अपने भीतर महसूस कर सकते हैं। इसे विज्ञान नकार नहीं सकता।

विज्ञान आत्मा को न नकारता है,न स्वीकार करता है। वह केवल इतना मानता है कि चेतना एक रहस्य है, जिसे हम अभी पुरी तरह नहीं समझ पाए हैं।

इसलिए आज के संदर्भ में कहा जा सकता है कि विज्ञान भले ही यह न बताए कि आत्मा क्या है, लेकिन अध्यात्म अनुभव के माध्यम से इस प्रश्न का उत्तर खोजने का मार्ग अवश्य प्रदान करता है।

FAQ : आत्मा क्या है? — इससे जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न–उत्तर

प्रश्न 1 : “हम एक आत्मा हैं” का क्या अर्थ है?
उत्तर : “हम एक आत्मा हैं” का अर्थ यह है कि हमारा वास्तविक स्वरूप शरीर, मन या बुद्धि नहीं, बल्कि वही चेतन तत्व है। यदि हम समझें कि आत्मा क्या है, तो स्पष्ट होता है कि शरीर बदलता रहता है, जबकि आत्मा साक्षी रूप में सदैव स्थिर रहती है।

प्रश्न 2 : क्या आत्मा और शरीर एक ही हैं?
उत्तर : नहीं। शरीर नश्वर है, जबकि आत्मा शाश्वत है। जब हम यह समझते हैं कि आत्मा क्या है, तब स्पष्ट होता है कि जैसे मनुष्य वस्त्र बदलता है, वैसे ही आत्मा शरीर बदलती है—यही गीता का मूल सिद्धांत है।

प्रश्न 3 : आत्मा दिखाई क्यों नहीं देती?
उत्तर : आत्मा सूक्ष्म है। जब हम यह समझने का प्रयास करते हैं कि आत्मा क्या है, तब स्पष्ट होता है कि जैसे विचार, प्रेम या चेतना दिखाई नहीं देती पर अनुभव की जाती है, वैसे ही आत्मा का अनुभव होता है, उसका प्रत्यक्ष दर्शन नहीं।

प्रश्न 4 : आत्मा का स्थान शरीर में कहाँ है?

उत्तर : आत्मा किसी एक स्थान तक सीमित नहीं है।

वह पूरे शरीर में चेतना के रूप में व्याप्त है, जैसे बिजली बल्ब में हर जगह प्रकाशित होती है।

आत्मा क्या है? आत्मा वह सूक्ष्म और सर्वव्यापी चेतना है जो शरीर के हर कोने में समान रूप से मौजूद रहती है, किसी अंग या जगह तक सीमित नहीं।

प्रश्न 5 : आत्मा स्त्री है या पुरुष?

उत्तर : आत्मा न स्त्री है, न पुरुष।

लिंग शरीर का गुण है, आत्मा चेतना है निर्लिंग, निर्विकार।

आत्मा क्या है? आत्मा वह शाश्वत तत्व है जो सभी द्वैतों (स्त्री-पुरुष, अच्छा-बुरा) से परे है, केवल शुद्ध अस्तित्व और चेतना।

प्रश्न 6 : मृत्यु के समय वास्तव में क्या मरता है?
उत्तर : मृत्यु में शरीर नष्ट होता है, आत्मा नहीं। जब हम गहराई से समझते हैं कि आत्मा क्या है, तब स्पष्ट होता है कि आत्मा शरीर छोड़कर अपनी यात्रा आगे बढ़ाती है, जबकि नाश शरीर का होता है।

प्रश्न 7 : आत्मा को कैसे जाना या अनुभव किया जा सकता है?

उत्तर : ध्यान, आत्मचिंतन, विवेक और साक्षी भाव से।

जब हम “मैं शरीर नहीं हूँ” ऐसा देखने लगते हैं, वहीं आत्मबोध प्रारंभ होता है।

प्रश्न 8 : गीता आत्मा के बारे में क्या कहती है?
उत्तर : गीता स्पष्ट रूप से बताती है कि आत्मा क्या है—वह न जन्म लेती है, न मरती है। इसी सत्य को श्रीकृष्ण ने कहा है:
“न जायते म्रियते वा कदाचिन।”

प्रश्न 9 : आत्मज्ञान से जीवन में क्या परिवर्तन आता है?

उत्तर : डर कम होता है,आसक्ति घटती है,शांति बढ़ती है,और जीवन अधिक अर्थपूर्ण हो जाता है।

प्रश्न 10 : क्या हर मनुष्य आत्मा है?
उत्तर : हाँ। जब हम यह समझते हैं कि आत्मा क्या है, तब स्पष्ट होता है कि जाति, धर्म, पद और उम्र से परे हर प्राणी के भीतर वही एक सार्वभौमिक चेतन आत्मा विद्यमान है।

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